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हर मनोकामना को पूर्ण कर देता है अपरा एकादशी का व्रत – जानें महत्व, …

Apara Ekadashi Vrat vidhi aur Katha

अपरा एकादशी- 30 मई 2019

एकादशी तिथि आरंभ -29 मई 2019 को 15 बजकर 21 मिनिट पर

एकादशी तिथि समाप्त- 30 मई 2019 को 16 बजकर 38 मिनिट पर

हिन्दू पंचाग के अनुसार प्रत्येक महीने की ग्यारस अर्थात ग्यारहवी तिथि एकादशी कहलाती है। हिन्दू धर्म में एकादशी का विशेष महत्व है। हिन्दू धर्म में एकादशी के दिन व्रत करना बहुत ही शुभ फलदायी माना जाता है। वैसे तो पूर्ण वर्षभर में कुल 24 एकादशियाँ होती है परन्तु मलमास जिसे अधिकमास कहा जाता है, उसमे कुल 26 एकादशियाँ होती है।

Apara Ekadashi Vrat vidhi aur Katha

प्रत्येक महीने में दो एकादशी होती है उनका अपना महत्व होता है। जेष्ठ मास के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की एकादशियाँ बहुत ही ख़ास मानी जाती है। सब एकादशियों में सबसे सर्वोत्तम निर्जला एकादशी मानी जाती है परन्तु कृष्ण एकादशी भी किसी एकादशी से कम नहीं है, इसे ही अपरा एकादशी के नाम से लोग जानते है, इस दिन व्रत करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है। अपरा एकादशी को अचला एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। आइए जानते है अपरा एकादशी की व्रत कथा एवं पूजा विधि के बारे में।

अपरा एकादशी व्रत पूजा विधि

एकादशी के व्रत में भगवान विष्णुजी की पूजा-अर्चना की जाती है। एकादशी के दिन साधक को प्रातः जल्दी उठकर स्नानादि के बाद व्रत का संकल्प लेना चाहिए। संकल्प लेने के पश्चात भगवान विष्णु, कृष्ण भगवान तथा बलराम जी की धुप, अगरबत्ती, पुष्प, फूल, तिल आदि से पूजा करनी चाहिए। इस दिन भगवान त्रिविक्रम की भी पूजा की जाती है। इस दिन बिना जल पिए निर्जल व्रत करना चाहिए परन्तु संभव न हो सके तो पानी तथा एक समय फलाहार ले सकते है।द्वादशी के दिन यानि पारण के दिन भगवान की पुन्हा पूजा अर्चना करें उसके बाद कथा पढ़ें। कथा पढ़ने के बाद प्रसाद बांटे और योग्य ब्राह्मण को दान-दक्षिणा देकर विदा करें। अंत में भोजन ग्रहण कर व्रत खोलना चाहिए।

व्रत से पूर्व किन बातों का विशेष ध्यान रखें

प्राचीन ग्रंथों के अनुसार जो श्रद्धालू एकादशी का व्रत करने के इच्छुक होते है उनको दशमी के दिन शाम में सूर्यास्त के पश्चात भोजन नहीं करना चाहिए।रात को भगवान विष्णु का ध्यान करना चाहिए उसके बाद ही सोना चाहिए।एकादशी के दिन सुबह उठकर भगवान विष्णुजी की पूजा करनी चाहिए। पूजा में मिष्ठान्न, तुलसी, चन्दन, श्रीखंड, गंगाजल तथा फलों का प्रसाद अर्पित करना चाहिए। व्रती को पूरा दिन झूठ, कपट, किसी के साथ धोखेबाजी, परनिंदा से स्वयं को दूर रखना चाहिए। एकादशी के दिन जो लोग व्रत नहीं करते उन्हें भी चावल खाने से परहेज करना चाहिए।

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अपरा एकादशी व्रत कथा

पौराणिक कथा के अनुसार एक राज्य में महीध्वज नाम का एक बहुत ही धर्मात्मा राजा था। राजा महीध्वज का छोटा भाई भी था जिसका नाम वज्रध्वज था। राजा महीध्वज जितना दयालू और नेक था भाई वज्रध्वज उतना ही क्रूर और पापी था। वज्रध्वज अपने भाई महीध्वज का द्वेष करता था। वज्रध्वज हमेशा राजा महीध्वज को मरने के लिए साजिश रचता था परन्तु नाकामयाबी हाथ लगती थी।

एक दिन वह अपने मंसूबे में कामयाब हो जाता है, और महीध्वज को मारकर जंगल में फिंकवा देता है और खुद राजा बनकर राज करने लगता है।असामायिक मृत्यु के कारण महीध्वज को प्रेत का जीवन जीना पड़ता है। वह पीपल के पेड़ पर रहने लगता है। महाध्वज की आकस्मिक मौत के बाद राज्य में उसके दुराचारी भाई से प्रजा दुखी थी और साथ ही अब महीध्वज भी प्रेत बनकर आने जाने वालों को दुःख पहुंचाते।

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एक दिन उसके पुण्य कर्मों का सौभाग्य के चलते उधर से एक महान पहुंचे हुए ऋषि गुजर रहे थे। उन्हें आभास हुआ कि कोई प्रेत उन्हें तंग करने का प्रयास कर रहा है।अपने तपोबल से उन्होंने भूत को देख लिया और उसका भविष्य सुधारने का जतन सोचने लगे। सबसे पहले उन्होंने प्रेत को पकडकर उसे अच्छाई का पाठ पढ़ाया फिर उसके मोक्ष के लिए स्वयं ही अपरा एकादशी का व्रत रखा और संकल्प लेकर अपने व्रत का पुण्य प्रेत को दान कर दिया।इस प्रकार उसे प्रेत जीवन से मुक्ति मिली और वो बैकुंठ गमन कर गया ।

अपरा एकादशी व्रत को करने से होनेवाले लाभ

  • जो भी जातक अपरा एकादशी का व्रत करता है उसको पुण्य फलों की प्राप्ति होती है।
  • इसके प्रभाव से मनुष्य की कीर्ति, मान-सम्मान और आर्थिक स्थिति मजबूत होती है।
  • इस व्रत के पुण्य से ब्रह्म ह्त्या, असत्य वचन, झूठ जैसे पापों से मुक्ति मिलती है।
  • इस व्रत को करने से मनुष्य को तीनों पुष्करों में स्नान के समान, गंगाजी के तट पर पिंड दान के समान फल की प्राप्ति होती है।

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